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शनिवार, 26 मार्च 2011

कोने में रखी एक किताब .......गुनाहों का देवता............भारतीनामा ( एक श्रंखला )



ये महज़ एक किताब नहीं , एक पूरा युग है जिसे मैंने जियो है और अब भी जी रहा हूं



ये इस ब्लॉग की पहली पोस्ट है । इस ब्लॉग के यहां होने की भी एक दिलचस्प वजह है । किताबें शुरू से ही बहुत लोगों की तरह में मेरे वही प्रिय दोस्त रहे हैं । ये अलग बात है कि इन किताबों के दायरे में पहले कॉमिक्स , फ़िर वेद प्रकाश शर्मा , गुलशन नंदा , और कर्नल रंजीत सरीखे लेखक आए । अपने संघर्ष के दिनों में मुझे मेरे एक सीनीयर प्रफ़ुल्ल भईया ने अचानक ही एक दिन मेरे हाथों में ये किताब रख दी । नाम था गुनाहों का देवता ..इस किताब ने हिंदी साहित्य की किताबों की तरफ़ दीवानेपन का वो दरवाज़ा मेरे भीतर खोल दिया कि आज कमोबेश मेरे पास लगभग छ सौ किताबें हैं वो भी मित्रों द्वारा पढने के बहाने टपाने के बावजूद भी ।


इन किताबों को पढने का अवसर , जी हां नियमित मैं कभी भी नहीं पढ पाता हूं ..अक्सर मुझे लंबे सफ़र में या फ़िर घर से बाहर कहीं समय बिताते समय मिल ही जाता है और कमाल दे्खिए कि इस ब्लॉग का जन्म भी हाल ही में चर्चित पुस्तक five point someone को रास्ते में पढते समय ही आया था । इन किताबों को पढते समय ये ख्याल आया कि हर किताब पाठक के कान में फ़ुसफ़ुसा के कुछ न कुछ कह ही जाती है और कमाल की बात ये है कि एक ही किताब पाठक के कान में हर बार अलग अलग बात कहती है । सोचा कि फ़िर वो क्या कहती है उसे सबके सामने रखने के लिए इससे अच्छा मंच तो हो ही नहीं सकता है ।


मैं बात कर रहा था गुनाहों का देवता की । अब इस किताब को दोबारो हाथ में उठा लिया है , मुझे नहीं मालूम कि इस किताब से बेहतर किताबें भी हिंद साहित्य में होंगी अवश्य ही होंगी लेकिन जो कुछ मैंने इस किताब में पाया है या अब भी पढने पर पाता हूं वो दूसरी कोई किताब नहीं दे सकती । चंदर , सुधा , पम्मी के इर्दगिर्द ..धरमवीर भारती ने अपने जादुई शब्दों का  जो ताना बाना बुना है उसमें एक पूरा युग समाहित है । मेरे पास जो संस्करण है

उसमें विवरण के रूप में ये दर्ज़ है :

लोकोदय ग्रन्थमाला : ग्रन्थांक 79

प्रकाशक :
भारतीय ज्ञानपीठ ,
18 , इन्स्टीट्यूशनल एरिया , लोदी रोड
नयी दिल्ली -११००३२

पेपरबैक संस्करण : 1998 (द्वितीय आवृत्ति )
मूल्य : 50.00 रुपये


कुछ कमाल की खास बातें ये कि किताब में कहीं भी धर्मवीर भारती के नाम के अलावा कुछ भी उनके बारे में नहीं कहा गया है । मसलन लेखक का भारीभरकम परिचय , उनकी शिक्षा दीक्षा का वर्णन , या पुरस्कारों की सूचना आदि सिर्फ़ नाम लिख के धर दिया सामने । इतना भर लिख कर


इस उपन्यास के नये संस्करण पर दो शब्द लिखते समय में समझ नहीं पा रहा हूं कि क्या लिखूं ? अधिक से अधिक मैं अपनी हार्दिक कृतज्ञता उन सभी पाठकों प्रति व्यक्त कर सकता हूं जिन्होंने इसकी कलात्मक अपरिपक्वता के बावजूद इसको पसन्द किय अहै । मेरे लिए इस उपन्यास का लिखना वैसा ही रहा है जैसा पीडा के क्षणों में पूरी आस्था से प्रार्थना करना , और इस समय भी मुझे ऐसा लग रहा है जैसे मैं वह प्रार्थना मन -ही-मन दोहरा रहा हूं , बस ..........


       अगली पोस्ट से" भारतीनामा "...गुनाहों का देवता का पन्ना दर पन्ना स्वाद ...मैं आपके सामने रखने का प्रयत्न करूंगा ..फ़िलहाल इस किताब से सिर्फ़ दो पंक्तियां पढिए


"बादशाहों की मुअत्तर ख्वाबगाहों में कहां , 
वह मजा जो भीगी-भीगी घास पर सोने में है, 
मुइतमइन बेफ़िक्र लोगों की हंसी में भी कहां 
लुत्फ़ जो एक दूसरे की देखकर रोने में है ।" 






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