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शुक्रवार, 2 अक्तूबर 2015

किताबें जीवन की सच्ची साथी







सबसे कम खर्चीला मनोरंजन होता  है किताबों से और ये स्थाई होता है : जार्ज बर्नार्ड शॉ


यही नहीं किसी और ने भी कहा है कि किताबें जिन्दगी के सबसे अच्छी दोस्त , सबसे करीब की रिश्तेदार और सबसे काबिल गुरु होती हैं | ये सच भी है वे यह बातें बखूबी जानते हैं जिनकी सच में ही पढने में रूचि हो जाती है | किताबों से पहला वाकफा जो इंसान का होता है वो अक्सर होता है पढाई लिखाई की किताबों से , शायद यही वजह है कि हमारे जैसे बहुत सारे नालायक बच्चों को उम्र के शुरुआती दिनों में किताबों से दोस्ती और नज़दीकी तो दूर कमोबेश वे दुश्मन सरीखे ही लगने लगते हैं | हालांकि हमारे दौर में तो बाल साहित्य और कामिक्स प्रचुर मात्रा में उपलब्ध था | चम्पक , चंदामामा , नंदन , बालहंस जैसी जाने कितनी ही बाल पत्रिकाएँ सभी बच्चों की पसंदीदा हुआ करती थीं | इनके साथ ही सचित्र छपने वाले कामिक्स का तो जैसे एक अलग ही तरह का दीवानापन हुआ करता था | उन दिनों रेडियो पर दिन में डायमंड पाकेट बुक्स प्रकाशन की चाचा चौधरी , बिल्लू , पिंकी , नागराज , मैन्ड्रेक , फैंटम , मोटू पतलू और इन जैसे पचासों कार्टून चरित्रों का स्थान आज के सुपर हीरोज़ और किसी भी बौलीवुड हीरो से कहीं ज्यादा हुआ करता था |

उम्र बढी तो हाथ आयी वो मोटी मोटी उपन्यासनुमा तिलस्म का संसार | वेद प्रकाश शर्मा , गुलशन नंदा , कर्नल रंजीत और जाने ऐसे कितने नामों और इन नामों द्वारा रचे गए पात्रों , विजय विकास , टाईगर और पता नहीं कौन कौन के मोहपाश में फंसने के दिन अब भी याद आते हैं तो रोमांच हो आता है | उन दिनों ग्रामीण क्षेत्रों में और शायद शहरी क्षेत्र में भी इन उपन्यासों को पचास पैसे और एक रुपये में किराए पर देने का चलन था | उफ़ वो रात को लालटेन की रोशनी में पूरे उपन्यास को एक ही झोंक में पढ़ जाने का जूनून | क्या अनाप शनाप रचा जाता था , बेशक अंतरिक्ष यान अब मंगल पर पहुंचा हो किन्तु उन दिनों तो उन उपन्यासों के पात्र मंगल क्या शनि और प्लूटो तक की सैर करके लड़ाई मारा मारी करके बाकायदा जीत के आते थे | वो मोटे मोटे उपन्यास न बोर करते थे और न ही थकाते थे और लगभग सबके तकियों के आसपास जरूर दिख जाया करते थे |


इसके आगे का सफ़र तय हुआ प्रतियोगिता परिक्षा के लिए बुनियादी पाठ्यपुस्तकों की घिसाई के साथ |जाने कितनी ही पत्रिकाओं अखबारों के अलावा सामान्य ज्ञान सहित इतिहास , भूगोल , विज्ञान , गणित , अंगरेजी , हिन्दी और सब विषयों को घोल घोल के  पीने की बारी थी | हमने उसमें भी कोइ कोर कसर नहीं छोडी | शायद उसी का परिणाम आगे अपेक्षित सफलता मिलना रहा | किन्तु इसी दौर में साथ के रूम मेट्स में से एक हमारे अग्रज भ्राता जैसे मित्र प्रफुल्ल भाई के पास "गुनाहों का देवता " जिसे धर्मवीर भारती का कालजयी उपन्यास माना जाता है , दिख गयी , हाथ में आते ही पूरी पढ़ डाली , दूसरी थी मुझे चाँद चाहिए , तीसरी देवदास और उसके बाद जो ये सिलसिला चला तो कब हरिवंश राय , नागार्जुन , महादेवी वर्मा , निर्मल वर्मा , आचार्य चतुरसेन और जाने कितने नए पुराने नामों की कृतियाँ आती रहीं और हम पढ़ते रहे | आज भी पांच सौ से अधिक कृतियाँ अपनी छोटे से कोने में सजी मुस्कुराती रहती हैं | दिल्ली के पुस्तक मेलों ने इसमें बड़ा साथ दिया | हर साल ढेरों पुस्तकें संग्रह में आती गयीं |


इसके साथ ही कुछ पेशेगत स्वाभाविकता में कुछ अपनी विधि की शिक्षा के कारण विधि की पुस्तकों का भी बारीकी से अध्ययन चलता रहा जो अब भी बदस्तूर जारी है | कमाल का रोचक विषय और उतनी ही गूढ़ और रोचक पुस्तकें हैं विधि की ..आजकल इनमें अध्यात्म और राष्ट्रीय साहित्य भी जुड़ गया है | सोचता हूँ कि यदि औसत उम्र साठ वर्ष भी हो तो भी पूरी ज़िंदगी में हम ऐसे न जाने कितने ही नायाब दोस्त , रिश्तेदार और गुरु पा सकते हैं .....तभी अक्सर कहता हूँ ..किताबें जिंदाबाद ..पढाई जिंदाबाद


दिल्ली पुस्तक मेले में इस बार खरीदी गयी पुस्तकें

मीनार बढ़ती रहे आनदं बढ़ता जाता है 



गुरुवार, 30 जनवरी 2014

किताबों से इश्क के किस्से ...







किसी के रूठने ,मनाने किसी के उतरने चढने का ये मौसम है ,
हमसे खुशबू आने लगी है कागज़ों की , पढने का ये मौसम है ....

ठीक ठीक तो नहीं जानता कि मुझे किताबों से कब इतना इश्क हो गया मगर जुनूनी तो यकीनन ही मैं शायद अपनी मैट्रिक परीक्षा के बाद से हो गया था पढाई के प्रति । सबसे पहले जो दो किताबें बेहद दिलचस्प और हमेशा ही साथ रहीं वो  थी डिक्शनरी और एटलस । हमने पढना तो पढना उन दोनों में बहुत सारे दिलचस्प खेल भी तलाश रखे थे ।मसलन एटलस में देशों का नाम ढूंढने वाला खेल ।
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मगर मैट्रिक के बाद पडी छुट्टियों और फ़िर उसके बाद पूरे कालेजियाने के दिनों में हमने कामिक्सों की दुनिया यानि कि फ़ैंटम , मैंड्रेक , चाचा चौधरी , फ़ौलादी सिंह , पिंकी , बिल्लू , रमन , मोटू पतलू , आदि की फ़्रैंडशिप से आगे बढते हुए , विजय , विकास , कर्नल रंजीत , वाली मोटे मोटे उपन्यासों की गोद में जा बैठे , उफ़्फ़ क्या दिन थे वे भी , होड सी लगी रहती थी पढने और खत्म करने की , किराए पर अठन्नी एक रुपए में भी मिल जाया करती थी । विजय विकास के कारनामें आज के कृष और जी वन से ज्यादा हैरतअंगेज़ हुआ करते थे , गजब की तिलस्मी दुनिया थी वो ,सबको एक मोहपाश में जकडे हुए , हमारे घर में चाचियों , मामियों तक के हाथों में गुलशन नंदा चमका करते थे ।
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वो दौर भी बीता और स्नातक में अंग्रेजी साहित्य को करीब से जाना , पढा , समझा , शेक्सपीयर की जादुई दुनिया में खूब डूबे उतराए , जॉन कीट्स की कविताई भी बांचीं  और फ़िर  अपने संघर्षों के दिनों में परिचय हुआ गुनाहों के देवता से , जी हां हिंदी साहित्य से मेरी पहली पहचान जिस कृति से हुई बल्कि कहना चाहिए कि जिस युग से हो गई उसने फ़िर मुझे अपने मोहपाश में जकड लिया । अगली किताब जो हाथ में थी वो थी "मुझे चांद चाहिए " , सुना था कि इस किताब पर बाद में कोई धारावाहिक भी बना था , लगभग सात सौ पृष्ठों की वो किताब मैंने शायद तीन बार पढी थी , हर बार मज़ा आया था ।
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इसके बाद तो जैसे एक जुनून सा हो गया मुझे , साहित्य की सारी किताबों को पढ जाने का और इसमें मेरा भरपूर साथ दिया राजधानी दिल्ली में प्रति वर्ष आयोजित होने वाले दिल्ली पुस्तक मेले और विश्व पुस्तक मेले ने , शायद बीते वर्ष को छोडकर मैं पिछले बहुत सालों से लगातार जाता रहा । और इसके साथ ही दरियागंज की किताबों की वो संडे मार्केट । प्रेमचंद , नागार्जुन , आचार्य चतुर सेन , बंकिम समग्र , शरत साहित्य , शिवानी , अमृता प्रीतम , कौन सा नाम लूं और कौन सा नहीं , कुल मिलाकर भूख बढती गई किताबों और उनमें बसी छुपी दुनिया को पहचानने की ।
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इसके बाद शुरू हुई असली परीक्षा जब विधि के छात्र के रूप में पाला पडा खूब भारी भारी गूढ समझ बूझ वाली विधि की पुस्तकों से । चूंकि कार्यक्षेत्र भी विधि का ही क्षेत्र रहा इसलिए मुझे इसे और बेहतर तरीके से जानने समझने की उत्कट इच्छा थी । जैसे जैसे विधि की पढाई करता जा रहा हूं और कानून के सारे हर्फ़ों को समझ रहा हूं उनकी बारीकी को जानने का प्रयास कर रहा हूं इस विषय के प्रति मेरा सम्मान बहुत ज्यादा बढता जा रहा है । इतने विस्तृत आयामों वाला कोई अन्य विषय मैंने नहीं पाया ।
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मगर सफ़र के दौरान अब भी मुझे सिर्फ़ साहित्य की पुस्तकें अच्छी लगती हैं विशेषकर कहानियां और उपन्यास । सफ़र के दौरान निश्चित कुछ सामानों की सूची में किताबें सबसे ऊपर होती हैं ।  चलते चलते एक याद और वो ये कि बहुत सारे उन कमीने दोस्तों का भी शुक्रिया जो बहाने से मेरी किताब ले भागे और पढने पुढने के बाद भी कमब्ख्तों ने वापस नहीं की , देवदास और मधुशाला दोनों ही दोबारा खरीदनी पडी थीं मुझे , मगर  किताबों से हुआ ये इश्क अब दिनों दिन ज्यादा जवान होता जाता है .................

मंगलवार, 28 फ़रवरी 2012

अथ जूतम जूता जुत्ते जुत्ते ....




इन दिनों आधुनिक काल में ईराकी समाज से से निकली प्रथा ..पदम पादुका पदे पदे ..यानि कि जूता चलाइए ..अभियान ने धीरे धीरे भारत में भी दोबारा से अपना महत्व स्थापित किया है । दोबारा से इसलिए कहे हैं काहे से कि ..श्री लाल शुक्ल  जी के इस ....राग दरबारी ..के एक अनमोल पन्ने पर , हमें इस प्रथा के प्रमाणिक होने के पुख्ता सबूत मिले हैं , देखिए





"इस बात ने वैद्य जी को और भी गम्भीर बना दिया , पर और  लोग उत्साहित हो उठे । बात जोता मारने की पद्धति और परम्परा पर आ गयी । सनीचर ने चहककर कहा कि जब खन्ना पर दनादन -दनादन पडने लगें तो हमें भी बताना । बहुत दिन से हमने किसी को जुतियाया नहीं है । हम भी दो-चार हाथ लगाने चलेंगे । एक आदमी बोला कि जूता अगर फ़टा हो और तीन दिन तक पानी में निगोया गया हो तो मारने में अच्छी आवाज़ करता और लोगों को दूर दूर तक सूचना मिल जाती है कि जूता चल रहा है । दूसरा बोला कि पढे-लिखे आदमी को जुतियाना हो तो गोरक्षक जूते का प्रयोग करना चाहिए ताकि मार तो पड जाये, पर ज्यादा बेइज़्ज़ती न हो । चबूतरे पर बैठे बैठे एक तीसरे आदमी ने कहा कि जुतिआने का सही तरीका यह है कि गिनकर सौ जूते मारने चले , निन्यानबे तक आते-आते पिछली गिनती भूल जाय और एक से गिनकर फ़िर नये सिरे से जूता लगाना शुरू कर दे । चौथे आदमी ने इसका अनुमोदन करते हुए कहा कि सचमुच जुतिआने का यही तरीका है इसलिए मैंने भी सौ तक गिनती याद करनी शुरू कर दी है ।"

रविवार, 26 फ़रवरी 2012

कलूटी लडकियां हर शाम मुझको छेड जाती हैं .......











इन दिनों राग दरबारी सुन रहे हैं , श्री लाल शुक्ल जी को पढते हुए गजब अनुभव हो रहा है , न सिर्फ़ ग्राम जीवन से परिचय हो रहा है बल्कि हर दो पन्ने के बाद एक नए किरदार से मुलाकात हो जाती है । अभी तो चंद पन्नों को ही पलटा है.....................


"खन्ना मास्टर का असली नाम खन्ना था । वैसे ही जैसे तिलक , पटेल ,गांधी , नेहरू आदि हमारे यहां जाति के नहीं , बल्कि व्यक्ति के नाम हैं । इस देश में जाति -प्रथा को खत्म करने की यही के सीधी सी तरकीब है । जाति से उसका नाम छीनकर उसे किसी आदमी का नाम देने से जाति के पास और कुछ नहीं रह जाता । वह अपने-आप खत्म हो जाती है "

का धांसू बात कहे हैं शुकुल जी .. पहिलका लंबर पर इहे राग छेडे हैं कुल 330 पेज है , गज्जबे है ..बताएंगे धीरे धीरे आपको भी .....




"कलूटी लडकियां हर शाम मुझको छेड जाती हैं ।" इस मिसरे से शुरू होनेवाली कविता उन्होंने अफ़ीम की डिबियों पर लिखी थीं ..उन्होंने माने रामाधीन भीखमखेडवी जी ..अईसा सूचना ..शुकुल जी ..राग दरबारी में देते हैं ..अब इत्ता और पता चल जाए कि उक्त कविता कहां प्राप्त होगी ...अन्यथा मिसरे ने हमारा भी मिजाज फ़डका दिया है ...सोच रहे हैं मिसरे के पीछे पीछे होकर हम भी कुछ लिख ही डालें |




देश में इंजीनियरों और डॉक्टरों की कमी है । कारण यह अहि कि इस देश के निवासी परम्परा में कवि हैं । चीज़ को समझने के पहले वे उस पर मुग्ध होकर कविता कहते हैं । भाखडा-बांध को देखकर समझने के पहले वे कह सकते हैं ,"अहा ! अपना चमत्कार दिखाने के लिए , देखो , प्रभु ने फ़िर से भारत-भूमि को चुना । " ऑपरेशन -टेबल पर पडी हई युवती कोद देखकर मतिराम-बिहारी की कविताएं दुहराने लग सकते हैं ।........राग दरबारी में श्रीलाल शुक्ल लिखते हैं । कमाल का उपन्यास है ,..जाने ,गांव देहात की कौन कौन गलियां घुमा रहे हैं शुकुल जी

अदालत में काम करते रहने के बावजूद आज तक अईसन परिभासा नय मिल सका जईसन सुकुल जी बता दिए " पुनर्जन्म के सिद्धान्त की ईजाद दीवानी की अदालतों में हुई है , ताकि वादी और प्रतिवादी इस अफ़सोस को लेकर न मरें कि उनका मुकदमा अधूरा ही पडा रहा । इअनके सहारे वे सोचते हुए चैन से मर सकते हैं कि मुकदमे का फ़ैसला सुनने के लिए अभी अगला जन्म तो पडा ही है "...राग दरबारी में


"ये यहां पब्लिक हेल्थ ए.डी.ओ हैं । जिसकी दुम में अफ़सर जुड गया , समझ लो अपने को अफ़लातून समझने लगा है " । ......अईसन अईसन घनघोर डेफ़िनेसन दिए हैं ..सुकुल जी न ...कि आपको जिंदगी का असली डेफ़िनेसन बूझा जाएगा ..

शुकुल जी बोले तो राग दरबारी में श्री लाल शुक्ल जी





अब तनिक कमीज माने कि शर्ट की परिभासा ," बुश्शर्ट, जो उनकी फ़िलसाफ़ी के अनुसार मैली होने के बावजूद कीमती होने के कारण पहनी जा सकती है " ....गज्जब हैं सुकुल जी ..जुलुम कर डाले हैं कसम से ....राग दरबारी ।


"यह हमारी गौरवपूर्ण परम्परा है कि असल बात दो चार घण्टे की बातचीत के बाद अन्त में ही निकलती है ।"...


"शास्त्रों में शूद्रों के लिए जिस आचरण का विधान है , उसके अनुसार चौखट पर मुर्गी बनकर उसने वैद्य जी को प्रणाम किया । इससे प्रकट हुआ है कि हमारे यहां आज भी शास्त्र सर्वोपरि है और जाति-प्रथा मिटाने की सारी कोशिशें अगर फ़रेब नहीं हैं तो रोमाण्टिक कार्रवाइयां हैं ।".....श्री लाल शुक्ल ...राग दरबारी में

गुरुवार, 19 मई 2011

हवा की खुशबू और बगीचों की घास से मोहब्बत......भारतीनामा





गुनाहों का देवता ..इस किताब को जाने कितनी ही बार पढ गया हूं ..कई बार एक ही सिटिंग में तो कई बार चुनिंदा चुनिंदा पन्नों को ..और बहुत बार कोई भी पन्ना खोल कर । इसका आकर्षण मुझे हर बार बांध के रख देता है । और इसके आकर्षण में बंध जाने या कहूं कि बंध कर रह जाने वाला शायद मैं अकेला नहीं हूं । मुझे नहीं पता कि खुद धर्मवीर भारती को गुनाहों का देवता को लिखते हुए या उसके बाद कैसा अनुभव हुआ होगा लेकिन एक पाठक के तौर पर मैं यकीनी तौर पर ये कह सकता हूं कि ये किताब एक चलचित्र की तरह आंखों के सामने चलती है और दृश्य बदलते जाते हैं । जाने वाला दृश्य आने वाले दृश्य का कौतूहल बढा देता है । और अगर आप प्रकृति के रूप के प्रेमी हैं तो समझिए कि आपको सुधा , बिनती , गेसू से प्यार हो न हो आपको पन्नों पर दर्ज़ मौसम , फ़ूल , पत्तियो , हवा की खुशबू और बगीचों की घास से मोहब्बत जरूर हो जाएगी । देखिए वो कैसे आसपास की प्रकृति में पात्रों को समाविष्ट कर लेते हैं ,। देखिए एक बानगी इसकी आप भी पढिए ।

एक ऐसी ही खुशनुमा सुबह थी , और जिसकी कहानी मैं कहने जा रहा हूं , वह सुबह से भी ज्यादा मासूम युवक , प्रभाती गाकर फ़ूलों को जगाने वाले देवदूत की तरह अल्फ़्रेड पार्क के लॉन पर फ़ूलों की सरजमीं के किनारे किनारे घूम रहा था। कत्थई स्वीटपी के रंग का पश्मीने का लम्बा कोट , जिसका एक कालर उठा हुआ था और दूसरे कालर में सरो की एक पत्ती बटन होल में लगी हुई थी, सफ़ेद मक्खन जीन का पतला पैण्ट और पैरों में सफ़ेद ज़री की पेशावरी सैण्डिलें , भरा हुआ गोरा चेहरा और ऊंचे चमकते हुए माथे पर झूलती हुई एक रूखी भूरी लटा । चलते-चलते उसने  एक रंग-बिरंगा गुच्छा इकट्ठा कर लिया था और रह-रह कर वह उसे सूंघ लेता था ।


पूरब के आसमान की गुलाबी पांखुरियां बिखरने लगी थीं और सुनहले पराग की एक बौछार सुबह के ताजे फ़ूलों पर बिछ रही थी । " अरे सुबह हो गई !" उसने चौंककर कहा और पास की एक बेंच पर बैठ गया । सामने से एक माली आ रहा था । " क्यों जी , लाइब्रेरी खुल गयी ?" अभी नहीं बाबूजी !" उसने जवाब दिया । वह फ़िर सन्तोष से बैठ गया उर फ़ूलों की पांखुरियां नोंचकर नीचे फ़ेंकने लगा । जमीन पर विछाने वाली सोने की चादर परतों पर परतें बिछाती जा रही थी और पेडों की छायाओं का रंग गहराने लगा था । उसकी बेंच के नीचे फ़ूलों की चुनी हुई पत्तियां बिखरी थीं और अब उसके पास सिर्फ़ एक फ़ूल बाकी रह गया था । हलके फ़ालसई रंग के उस फ़ूल पर गहरे बैंजनी डोरे थे ।

धर्मवीर भारती , ने पूरे उपन्यास में प्रकृति को शब्दों में पिरोने के लिए कमाल की जादूगरी दिखाई है जो शायद ही अन्य किसी कृति में दिखाई दिया हो । खुद धर्मवीर भारती भी शायद उसे दोहरा नहीं पाए । और इसीलिए ये एक कालजयी कृति बन गई , एक ऐसी किताब जिसके लिए मुझे हमेशा से लगता रहा है कि , ये किताब एक युग है जिसे पाठक पढते हुए जीता है । देखिए कुछ और पंक्तियां ...
चित्र गूगल से साभार , गुनाहों का देवता में चित्रित प्रकृति की छवि तो दुर्लभ है जिसे सिर्फ़ महसूस किया जा सकता है

और उसे दूसरा शौक था कि फ़ूलों के पौधों के पास से गुजरते हुए हर फ़ूल को समझने की कोशिश करना । अपनी नाजुक टहनियों पर हंसते-मुस्कराते हुए ये फ़ूल जैसे अपने र्म्गों की बोली में आदमी से जिन्दगी का जाने कौन सा राज कहना चाहते हैं । और ऐसा लगता है जैसे हर फ़ूल के पास अपना व्यक्तिगत सन्देश है जिसे वह अपने दिल की पांखुरियों मेम आहिस्ते से सहेज कर रखे हुए है कि कोई सुनने वाला मिले और वह अपनी दास्तां कह जाये । पौधे की ऊपरी फ़ुनगी पर मुसकराता हुआ आसमान की तरफ़ मुंह किये हुए यह गुलाब जो रात-भर सितारों की मुसकराहट चुपचाप पीता रहा है म यह अपनी मोतियों-पांखुरियों के होठों से जाने क्यों खिलखिलाता ही जा रहा है । जाने इसे कौन सा रहस्य मिल गया है । और वह एक नीचे वाली टहनी में आधा झुका हुआ गुलाब, झुकी पलकों सी पांखुरियां और दोहरे मखमली तार सी उसकी डण्डी , यह गुलाब जाने क्यों उदास है ? और यह दुबली पतली लम्बी सी नाजुक कली जो बहुत सावधानी से हरा आंचल लपेटे है और प्रथम ज्ञात-यौवना की तरह लाज में जो सिमटी तो सिमटी ही चली जा रही है , लेकिन जिसके यौवन की गुलाबी लपटें सात हरे पर्दों में से झलकी ही पढती हैं , झलकी ही पडती हैं । और फ़ारस के शाहजादे जैसा शान से खिला हुआ पीला गुलाब ! उस पीले गुलाब के पास आकर चन्दर रुक गया और झुककर देखने लगा । कातिक पूनो की चांद से झरने वाले अमृत को पीने के लिए व्याकुल किसी सुकुमार , भावुक परी की फ़ली हुए अंजलि के बराबर बडा सा वह फ़ूल जैसे रोशनी बिखेर रहा था । बेगमबेलिया के कुंज से छनकर आने वाली तोतापंखी धूप ने जैसे उस पर धान-पान की तरह खुशनुमा हरियाली बिखेर दी थी ।


कल पढेंगे कुछ और पन्ने .......आप पढ रहे हैं न

शुक्रवार, 1 अप्रैल 2011

न तो वो लखनऊ रहा न ही लखनऊ की वो गलियां ..........भारतीनामा ..




गुनाहों का देवता के हर पन्ने को पर धर्मवीर भारती द्वारा शब्दों का बुना हुआ एक ऐसा संसार मिलेगा जिसमें आपको न सिर्फ़ उस खास पन्ने पर रची गई दुनिया एक एक झलक ..बल्कि वहां उड रही धूल और बह रही ठंडी हवा , पेडों की छाया , धूप की ठसक और घास पत्तों की खुशबू तक का एहसास होगा । शब्दों को एक साथ ऐसे रख कर आप वास्तविक दुनिया को ...क्योंकि इस किताब को पढने के बाद आप ये मान ही नहीं सकते कि कि ये काल्पनिक उपन्यास हो सकता है , किताब पर इतनी भली भांति उकेर सकते हैं ..इस बात को गुनाहों का देवता से ही समझा जा सकता है ।

चलिए कुछ शुरूआत की पंक्तियों को देखते हैं ,

"अगर पुराने जमाने की नगर-देवता की और ग्राम-देवता की कल्पनाएं आज भी मान्य होतीं तो मैं कहता कि इलाहाबाद का नगर-देवता जरूर कोई रोमैण्टिक कलाकार है । ऐसा भी लगता है कि इस शहर की बनावट ,गठन , जिन्दगी और  रहन-सहन मे कोई बंधे -बंधाये नियम नहीं , कहीं कोई कसाव नहीं , हर जगह एक स्वच्छन्द खुलाव, एक बिखरी हुई सी अनियमितता । बनारस की गलियों से भी पतली गलियां और लखनऊ की सडकों से चौडी सडकें । यार्कशायर और ब्रिटेन के उपनगरों का मुकाबला करने वाले सिविल लाइन्स और दलदलों की गन्दगी को मात करने वाले मुहल्ले । मौसम में भी कहीं कोई सम नहीं ,कोई सन्तुलन नहीं  सुबहें मलयजी. दोपहरें अंगारी , तो शामें रेशमी । धरती ऐसी कि सहारा के रेगिस्तान की तरह बालू भी मिले , मालवा की तरह्य हरे-भरे खेत भी मिलें और ऊसर और परती की भी कमीं नहीं । सचमुच लगता है कि प्रयाग का नगर-देवता स्वर्ग-कुंजों से निर्वासित कोई मनमौजी कलाकार है जिसके सृजन में हर रंग के डोरे हैं ।"


देखिए क्या संभव है कि अब कोई लखनऊ की शफ़्फ़ाक नज़ाकत को कोई इस तरह से आपके सामने रख सके ..आज न तो वो लखनऊ रहा  न ही लखनऊ की वो गलियां . तो कोई चाहे भी तो उस समय को कैसे जी सकता है , न सिर्फ़ लखनऊ , बल्कि प्रयाग , इलाहाबाद , बनारस कुछ भी तो नहीं छूटा है इस भारतीनामा में । इन पंक्तियों में जब यार्कशायर और ब्रिटेन के उपनगरों के कुछ खास स्थानों का ज़िक्र उन्होंने इतने पैने अंदाज़ में और तुलनात्मक रूप से किया है कि स्पष्ट महसूस होता है कि जैस कि अक्सर कोशिश की जाती रही है कि ब्रितानी व्यवस्था और नगर तत्कालीन भारतीय नगरीय व्यवस्था से अच्छे थे की पूरी बखिया उधेड कर रखे दी है ।  आगे की पंक्तियों में शब्द संयोजन का आलम देखिए

सुबहें मलयजी ,
दोपहरें अंगारी ,
शामें रेशमी ,

तीनों पहर को इतने सुंदर विशेषण के साथ कभी देखा पढा और कहीं अन्यत्र ।  अब आगे पढिए

"और चाहे जो हो , नगर इधर क्वार ,कार्तिक तथा उधर वसन्त के बाद और होली के बीच के मौसम से इलाहाबाद का वातावरण नैस्टशिर्यम और पैंजी के फ़ूलों से भी ज्या खूबसूरत और आम के बौरों की खुशबू से भी ज्यादा महकदार होता है । सिविल लाइन्स हो या अल्फ़्रेड पार्क , गंगातट हो या खुसरूबाग , लगता है कि हवा एक नटखट दोशीजा की तरह कलियों के आंचल और लहरों के मिजान से छेडखानी करती चलती है । और अगर आप सर्दी से बहुत नहीं डरते तो आप जरा एक ओवरकोट डालकर सुबह-सुबह घूमने निकल जायें तो इन खुली हुई जगहों की फ़िजां इठलाकर आपको अपने जादू में बांध लेगी। खास तौर से पौ फ़टने से पहले तो आपको एक बिल्कुल नयी अनुभूति होगी । वसन्त के नय-नये मौसमी फ़ूलों के रंग से मुकाबला करने वाली हलकी सुनहली, बाल-सूर्य की अंगुलियां सुबह की राजकुमारी के गुलाबी वक्ष पर बिखरे हुए भौंराले गेसुओं को धीरे-धीरे हटाती जाती हैं और क्षितिज पर सुनहली तरुणाई बिखर पढती है । "


 इस किताब में धर्मवीर भारती ने जैसे धरती के एक एक पोर को , और उस पर बहने चलने वाली हवा के रेशे रेशे को अपन जादुई शब्दों से जिस तरह से अपने पाठकों के सामने रखा है पाठक उसे पढते हुए ठीक उसी तरह का महसूस करता है जैसा कि धर्मवीर भारती ने इसे उकेरते हुए महसूसा होगा ।

इस किताब ने अपने पाठकों को हर बार एक नया शब्द , एक नया अहसास , एक नया युग , एक नई कहानी , और जाने क्या क्या दिया है । सबसे विस्मयकारी बात ये है कि आज भी इसका जादू न सिर्फ़ बरकरार है बल्कि तरूणाई से लेकर परिपक्वता पाए हर पाठक को एक अलग ही अनुभव देता है ।..
















शनिवार, 26 मार्च 2011

कोने में रखी एक किताब .......गुनाहों का देवता............भारतीनामा ( एक श्रंखला )



ये महज़ एक किताब नहीं , एक पूरा युग है जिसे मैंने जियो है और अब भी जी रहा हूं



ये इस ब्लॉग की पहली पोस्ट है । इस ब्लॉग के यहां होने की भी एक दिलचस्प वजह है । किताबें शुरू से ही बहुत लोगों की तरह में मेरे वही प्रिय दोस्त रहे हैं । ये अलग बात है कि इन किताबों के दायरे में पहले कॉमिक्स , फ़िर वेद प्रकाश शर्मा , गुलशन नंदा , और कर्नल रंजीत सरीखे लेखक आए । अपने संघर्ष के दिनों में मुझे मेरे एक सीनीयर प्रफ़ुल्ल भईया ने अचानक ही एक दिन मेरे हाथों में ये किताब रख दी । नाम था गुनाहों का देवता ..इस किताब ने हिंदी साहित्य की किताबों की तरफ़ दीवानेपन का वो दरवाज़ा मेरे भीतर खोल दिया कि आज कमोबेश मेरे पास लगभग छ सौ किताबें हैं वो भी मित्रों द्वारा पढने के बहाने टपाने के बावजूद भी ।


इन किताबों को पढने का अवसर , जी हां नियमित मैं कभी भी नहीं पढ पाता हूं ..अक्सर मुझे लंबे सफ़र में या फ़िर घर से बाहर कहीं समय बिताते समय मिल ही जाता है और कमाल दे्खिए कि इस ब्लॉग का जन्म भी हाल ही में चर्चित पुस्तक five point someone को रास्ते में पढते समय ही आया था । इन किताबों को पढते समय ये ख्याल आया कि हर किताब पाठक के कान में फ़ुसफ़ुसा के कुछ न कुछ कह ही जाती है और कमाल की बात ये है कि एक ही किताब पाठक के कान में हर बार अलग अलग बात कहती है । सोचा कि फ़िर वो क्या कहती है उसे सबके सामने रखने के लिए इससे अच्छा मंच तो हो ही नहीं सकता है ।


मैं बात कर रहा था गुनाहों का देवता की । अब इस किताब को दोबारो हाथ में उठा लिया है , मुझे नहीं मालूम कि इस किताब से बेहतर किताबें भी हिंद साहित्य में होंगी अवश्य ही होंगी लेकिन जो कुछ मैंने इस किताब में पाया है या अब भी पढने पर पाता हूं वो दूसरी कोई किताब नहीं दे सकती । चंदर , सुधा , पम्मी के इर्दगिर्द ..धरमवीर भारती ने अपने जादुई शब्दों का  जो ताना बाना बुना है उसमें एक पूरा युग समाहित है । मेरे पास जो संस्करण है

उसमें विवरण के रूप में ये दर्ज़ है :

लोकोदय ग्रन्थमाला : ग्रन्थांक 79

प्रकाशक :
भारतीय ज्ञानपीठ ,
18 , इन्स्टीट्यूशनल एरिया , लोदी रोड
नयी दिल्ली -११००३२

पेपरबैक संस्करण : 1998 (द्वितीय आवृत्ति )
मूल्य : 50.00 रुपये


कुछ कमाल की खास बातें ये कि किताब में कहीं भी धर्मवीर भारती के नाम के अलावा कुछ भी उनके बारे में नहीं कहा गया है । मसलन लेखक का भारीभरकम परिचय , उनकी शिक्षा दीक्षा का वर्णन , या पुरस्कारों की सूचना आदि सिर्फ़ नाम लिख के धर दिया सामने । इतना भर लिख कर


इस उपन्यास के नये संस्करण पर दो शब्द लिखते समय में समझ नहीं पा रहा हूं कि क्या लिखूं ? अधिक से अधिक मैं अपनी हार्दिक कृतज्ञता उन सभी पाठकों प्रति व्यक्त कर सकता हूं जिन्होंने इसकी कलात्मक अपरिपक्वता के बावजूद इसको पसन्द किय अहै । मेरे लिए इस उपन्यास का लिखना वैसा ही रहा है जैसा पीडा के क्षणों में पूरी आस्था से प्रार्थना करना , और इस समय भी मुझे ऐसा लग रहा है जैसे मैं वह प्रार्थना मन -ही-मन दोहरा रहा हूं , बस ..........


       अगली पोस्ट से" भारतीनामा "...गुनाहों का देवता का पन्ना दर पन्ना स्वाद ...मैं आपके सामने रखने का प्रयत्न करूंगा ..फ़िलहाल इस किताब से सिर्फ़ दो पंक्तियां पढिए


"बादशाहों की मुअत्तर ख्वाबगाहों में कहां , 
वह मजा जो भीगी-भीगी घास पर सोने में है, 
मुइतमइन बेफ़िक्र लोगों की हंसी में भी कहां 
लुत्फ़ जो एक दूसरे की देखकर रोने में है ।" 






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