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शुक्रवार, 1 अप्रैल 2011

न तो वो लखनऊ रहा न ही लखनऊ की वो गलियां ..........भारतीनामा ..




गुनाहों का देवता के हर पन्ने को पर धर्मवीर भारती द्वारा शब्दों का बुना हुआ एक ऐसा संसार मिलेगा जिसमें आपको न सिर्फ़ उस खास पन्ने पर रची गई दुनिया एक एक झलक ..बल्कि वहां उड रही धूल और बह रही ठंडी हवा , पेडों की छाया , धूप की ठसक और घास पत्तों की खुशबू तक का एहसास होगा । शब्दों को एक साथ ऐसे रख कर आप वास्तविक दुनिया को ...क्योंकि इस किताब को पढने के बाद आप ये मान ही नहीं सकते कि कि ये काल्पनिक उपन्यास हो सकता है , किताब पर इतनी भली भांति उकेर सकते हैं ..इस बात को गुनाहों का देवता से ही समझा जा सकता है ।

चलिए कुछ शुरूआत की पंक्तियों को देखते हैं ,

"अगर पुराने जमाने की नगर-देवता की और ग्राम-देवता की कल्पनाएं आज भी मान्य होतीं तो मैं कहता कि इलाहाबाद का नगर-देवता जरूर कोई रोमैण्टिक कलाकार है । ऐसा भी लगता है कि इस शहर की बनावट ,गठन , जिन्दगी और  रहन-सहन मे कोई बंधे -बंधाये नियम नहीं , कहीं कोई कसाव नहीं , हर जगह एक स्वच्छन्द खुलाव, एक बिखरी हुई सी अनियमितता । बनारस की गलियों से भी पतली गलियां और लखनऊ की सडकों से चौडी सडकें । यार्कशायर और ब्रिटेन के उपनगरों का मुकाबला करने वाले सिविल लाइन्स और दलदलों की गन्दगी को मात करने वाले मुहल्ले । मौसम में भी कहीं कोई सम नहीं ,कोई सन्तुलन नहीं  सुबहें मलयजी. दोपहरें अंगारी , तो शामें रेशमी । धरती ऐसी कि सहारा के रेगिस्तान की तरह बालू भी मिले , मालवा की तरह्य हरे-भरे खेत भी मिलें और ऊसर और परती की भी कमीं नहीं । सचमुच लगता है कि प्रयाग का नगर-देवता स्वर्ग-कुंजों से निर्वासित कोई मनमौजी कलाकार है जिसके सृजन में हर रंग के डोरे हैं ।"


देखिए क्या संभव है कि अब कोई लखनऊ की शफ़्फ़ाक नज़ाकत को कोई इस तरह से आपके सामने रख सके ..आज न तो वो लखनऊ रहा  न ही लखनऊ की वो गलियां . तो कोई चाहे भी तो उस समय को कैसे जी सकता है , न सिर्फ़ लखनऊ , बल्कि प्रयाग , इलाहाबाद , बनारस कुछ भी तो नहीं छूटा है इस भारतीनामा में । इन पंक्तियों में जब यार्कशायर और ब्रिटेन के उपनगरों के कुछ खास स्थानों का ज़िक्र उन्होंने इतने पैने अंदाज़ में और तुलनात्मक रूप से किया है कि स्पष्ट महसूस होता है कि जैस कि अक्सर कोशिश की जाती रही है कि ब्रितानी व्यवस्था और नगर तत्कालीन भारतीय नगरीय व्यवस्था से अच्छे थे की पूरी बखिया उधेड कर रखे दी है ।  आगे की पंक्तियों में शब्द संयोजन का आलम देखिए

सुबहें मलयजी ,
दोपहरें अंगारी ,
शामें रेशमी ,

तीनों पहर को इतने सुंदर विशेषण के साथ कभी देखा पढा और कहीं अन्यत्र ।  अब आगे पढिए

"और चाहे जो हो , नगर इधर क्वार ,कार्तिक तथा उधर वसन्त के बाद और होली के बीच के मौसम से इलाहाबाद का वातावरण नैस्टशिर्यम और पैंजी के फ़ूलों से भी ज्या खूबसूरत और आम के बौरों की खुशबू से भी ज्यादा महकदार होता है । सिविल लाइन्स हो या अल्फ़्रेड पार्क , गंगातट हो या खुसरूबाग , लगता है कि हवा एक नटखट दोशीजा की तरह कलियों के आंचल और लहरों के मिजान से छेडखानी करती चलती है । और अगर आप सर्दी से बहुत नहीं डरते तो आप जरा एक ओवरकोट डालकर सुबह-सुबह घूमने निकल जायें तो इन खुली हुई जगहों की फ़िजां इठलाकर आपको अपने जादू में बांध लेगी। खास तौर से पौ फ़टने से पहले तो आपको एक बिल्कुल नयी अनुभूति होगी । वसन्त के नय-नये मौसमी फ़ूलों के रंग से मुकाबला करने वाली हलकी सुनहली, बाल-सूर्य की अंगुलियां सुबह की राजकुमारी के गुलाबी वक्ष पर बिखरे हुए भौंराले गेसुओं को धीरे-धीरे हटाती जाती हैं और क्षितिज पर सुनहली तरुणाई बिखर पढती है । "


 इस किताब में धर्मवीर भारती ने जैसे धरती के एक एक पोर को , और उस पर बहने चलने वाली हवा के रेशे रेशे को अपन जादुई शब्दों से जिस तरह से अपने पाठकों के सामने रखा है पाठक उसे पढते हुए ठीक उसी तरह का महसूस करता है जैसा कि धर्मवीर भारती ने इसे उकेरते हुए महसूसा होगा ।

इस किताब ने अपने पाठकों को हर बार एक नया शब्द , एक नया अहसास , एक नया युग , एक नई कहानी , और जाने क्या क्या दिया है । सबसे विस्मयकारी बात ये है कि आज भी इसका जादू न सिर्फ़ बरकरार है बल्कि तरूणाई से लेकर परिपक्वता पाए हर पाठक को एक अलग ही अनुभव देता है ।..
















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